काँटों का साज सजाता हूँ

अंगार उगलती है धरती,
रेतों का घर है बना हुआ।
इस नीरव तप्त मरुस्थल में,
यह कौन वीर है तना हुआ?
कलिकाल दंड पर अट्टहास,
करता है,हँसी उड़ाता है।
निष्फल कर विकल प्रहारों को,
फिर समाधिस्थ हो जाता है।
हे योगि राज यह बतलावो,
यह शक्ति कहाँ से पाये हो?
जो काल शीश को पद नत कर,
नव गीत क्रान्ति का गाये हो।
हे काल -प्रेमिका,सुनो मुझे,
कैक्टस हूँ,मरु में जलता हूँ।
जल कर बद सूरत होता हूँ।
पर मृत्यु वरण न करता हूँ।
न रुकता हूँ,न झुकता हूँ,
हर परिवर्तन सह जाता हूँ।
पाताल लोक का वक्ष चीर,
जल राशि छीन कर लाता हूँ।
मेरा वक्षस्थल था विशाल।
ऐश्वर्य भरा उद्दीप्त भाल।
जल वायु चरण को धोते थे।
हम सौख्य सिंधु में सोते थे।
वासंतिक सुषमा छायी थी।
धरती में रूमानी आयी थी।
नदियाँ जल से लहराती थी।
चिड़िया कल गान सुनाती थी।
जीवन सौरभ से सुरभित था।
यह हृदय प्रेम से पुलकित था।
सहसा सुख का दिन बीत गया।
कलिकाल समर में जीत गया।
धरती में हुआ महा कम्पन।
मरु भूमि बन गया नन्दन वन।
जल राशि गया पाताल लोक।
धरती को घेरा महा शोक।
परिजन सब काल के ग्रास हुए।
झूठे अपने विश्वास हुए।
दुर्दिन के विकट थपेड़ों को,
जब याद हृदय में लाता हूँ।
एक तिमिर लोक में एकाकी,
योद्धा अपने को पाता हूँ।
न रुकता हूँ,न झुकता हूँ,
हर परिवर्तन सह जाता हूँ।
पाताल लोक का वक्ष चीर,
जल राशि छीन कर लाता हूँ।
हर मीत गया,सब प्रीत गया,
कलिकाल सभी को लील गया।
बस रेत रेत ही छाया था।
अस्तित्व पे संकट आया था।
तब पूर्वज गण का स्वर आया।
नैराश्य भाव को बिखराया।
हे पुत्र उठो,भय को त्यागो।
भिक्षा जीवन की मत माँगो।
तुम भेदो यह पाषाण खण्ड।
तोड़ो अन्यायी का घमंड।
कुल कीर्ति में दाग नहीं लाना।
इस युद्ध में पीठ न दिखलाना।
यह काल उसी का होता है।
जो नींद चैन सब खोता है।
सुन आसमान से यह पुकार।
चल पड़ा राह पर निर्विकार।
मैं गिरा,उठा,सैकड़ों बार।
तोड़ा गिन गिन कर व्यूह द्वार।
भूगर्भ में झंडा फहराया।
जल को धरती तल पर लाया।
इस मरू खंड में योगी बन,
काँटों का साज सजाता हूँ।
विष धर के फन पर नर्तन कर,
मैं सारा विष पी जाता हूँ।
न रुकता हूँ,न झुकता हूँ,
हर परिवर्तन सह जाता हूँ।
पाताल लोक का वक्ष चीर,
जल राशि छीन कर लाता हूँ।

राज नाथ तिवारी
14-10-2016

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